कबीर के कुछ प्रसिद्ध दोहों


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कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सब की खैर
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर!

साँईं इतना दीजिये जामें कुटुम्ब समाये
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाये।

बुरा जो देखन में चला, बुरा ना मिलया कोई
जो मन खोजा आपना, मुझ से बुरा ना कोई।

माया मरी ना मन मरा, मर मर गये शरीर
आशा त्रिश्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोये
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होये।

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोए
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोए।

धीरे धीरे रे मना, धीरज से सब होये
माली सिंचे सौ घड़ा, ऋतु आये फ़ल होये।

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोये
औरों को शीतल करे, आपहुँ शीतल होये।

जाती ना पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार की पड़ी रेहन जो म्यान।

माटी कहे कुम्हार से, काहे रोंदे मोहे
ईक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूगीं तोहे।

साधु ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुहाय
सार सार को गही रहे, थोथा देय उडाय।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नही, फल लगे अति दूर।

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4 thoughts on “कबीर के कुछ प्रसिद्ध दोहों

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